संकट

कुछ यूँ ज़िन्दगियों पर हमारी संकट है आया,
कि रंग ने भी अब दंगा है भड़काया।
सोच में है कि बस की जगह पैदल ही चले जाते,
क्योंकि स्कूल की जगह उन्हें अस्पताल में पाया।
कहीं खेलने गई थी तो कहीं बकरियों को खिलाने,
शिकार बना ली गई मासूम जानें, जहां भी उन्हें पाया।
कोई 15 मिनट मांग रहा, तो कोई पान की दुकान के सुझाव दे रहा,
राजनीति में तो लेन-देन का ये एक अनोखा ही मंज़र सामने आया। 
चैनल दर चैनल घूमते-घूमते उनकी 'द डिबेट' का दंगल देखकर, 
टी.वी. को ही श्रद्धांजलि दे देने का ख्याल आया।
किसी के घोड़ी चढ़ने पर, किसी के डी.जे बजाने पर,
समझ नहीं आता कि उनकी इज्ज़त पर कैसा खतरा मंडराया।
बेजु़बानों की इस बस्ती में रह रहकर,
कुछ चुनिंदा बोलने वालों को देखकर हौसला है पाया।
तुम भी कुछ बोलना सीख ही लो यारों,
क्योंकि सिर्फ मेरी ही नहीं तुम्हारी भी ज़िंदगी पर संकट है आया।।

Comments

  1. हृदयस्थ भावों को किस बखूबी से पेश किया है....कि एक लड़की होने के नाते हर लफ्ज़ से आत्मीयता महसूस हो रही है....और बेशक हर आवाज़ को मिलकर साथ खड़ा होना होगा क्योंकि अगर आज सवाल किसी और का है,त कल हमारा भी हो सकता है.... तुम्हारे शब्दों के आगे झुक कर सजदा करती हूं
    -कनक

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  2. Behad hi behtreen dhng se bhavo ko abhivyakt kiya h..

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  4. Man ki bath vakhya k sath in panktiyo meh dikhai detha h ati sunder or man say likha Gaya ( keep it up )😇

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