असंवेदनशीलता के चरम पर
असंवेदनशीलता
के चरम पर
इंसानों
की बस्ती में आज इंसानियत
लापता है,
लाखों
दिलों में आज संवेदनाएं लापता
हैं,
दरिंदों
से भर चुका है ये दौर,
मुश्किल
ये है कि उनसे अधिक दरिंदें
नकाबपोशों की आज सत्ता है.
उसकी
मासूमियत नहीं पिघला सकी उनके
हैवान मन को,
वो
असहाय उस हैवानियत को झेलकर
आखिर हार गयी उस जंग को
हारकर
भी फिर रोज़ हार रही है वो,
अपराधियों
को खुला छोड़ने के लिए नारे लग
रहे है जो
ये
आज नहीं, ये
कल नहीं ये हर दिन की सच्चाई
बन चुकी है,
तभी
तो हर पल अब इंसानियत शर्म से झुक चुकी है
मानव
समाज के रूप में आज कहाँ खड़े
हैं हम,
क्या
खुद से भी नज़रें मिलाने लायक
रह गये हैं हम
आदर्श
लोकतंत्र की ये कैसी रीत है,
कि
दरिंदगी की घटनाओं पर भी धर्म
की हो रही जीत है
कुंठाओं
से रोज़ भर जाता है अब मन,
खुद
से ही सवाल कर लो दोस्तों ये
कहाँ आ गये हम……..
Very nice di.
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteInsaan hokar insaano se Insaaniyat ki kaamna karna bekar hai yaha .
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