आज चाह रहा है मन कि...

आज  रूह किसी याद में खोई हुई है ,
कहीं जाने की तमन्ना सी जगी है , 
चाह रहा है मन कि
दूर चला जाये ऐसी आबोहवा से
जिसमे अब रोज़ महसूस होती है घुटन।
चाह रहा है मन कि
दूर चला जाए इन कंक्रीट के जंगलो और सीमेंट मकानों से
जो विकास  के नाम पर संवेदनहीन होते जा रहे है।

बस चाह रहा है मन मेरा कि
चला जाये उस जंक्शन पर जहां बड़े अक्षरों में दुर्ग स्टेशन लिखा हो ,
और वहीं से कुछ 70 किमी दूर आज मन है अपने गाँव जाने का ,
जहां आज भी पीएम 2.5 और 10 का खतरा नहीं ,
जहां आज भी धुल उड़ाती कच्ची सड़कें नज़र आती हैं ,
जहां आज भी सुबह सुबह घरों के आँगन को मिट्टी से लेपा जाता है।
 बस यूँ ही मन कर जाता है कभी कभी इंडिया से दूर जाकर भारत में रहने का। 

 

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