उसने ही तो संजोया था इस शहर को

उसने ही उन धूपभरी दुपहरों में,
ढलती हुई उमस की शामों में,
पसीने से तर बतर होकर,
संजोया था उस शहर को।
उसने ही पूस की उन सर्द रातों में,
कंपकपाते हुए शरीर का उन चिथड़ों में,
शीतलहरों से टकराकर,
संजोया था उस शहर को।
आज उस शहर ने इक पल में उसे पराया कर दिया,
तेरी क्या ही महत्ता है ये सवाल खड़ा कर दिया।
हज़ारों मील चलने पर भी उस सड़क ने,
खुद को बनाने वाले को न पहचाना।
दस महीने की उस बच्ची को आज पहली बार अपने पिता के कंधे पर भी दर्द महसूस हो रहा होगा,
लेकिन अभी भी मज़हब की आग को जलाए रखने वालों का दिल न पसीज़ा होगा।
जो आज सड़कों पर है,
सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर है,
घर जाने को आतुर पर मंज़िल धूमिल है,
उन्हीं लाखों ने ही तो संजोया था हमारे शहर को। 

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