शुक्रिया, रवीश सर
“नमस्कार,
मैं रवीश कुमार"
अब ये महज़ चंद
शब्द नहीं बल्कि गवाह है इस
बात का कि जब देश का अधिकांश
मीडिया सत्ता की चाटुकारिता
में लिप्त था तब एक पत्रकार
अपनी पूरी काबिलियत से उसी
सत्ता को हर स्तर पर आईना दिखाने
का कार्य कर रहा था।
रवीश
कुमार, एक
ऐसा नाम जो किसी को जननायक की
तरह लगता है तो किसी को सत्ता
को हर दम चुनौती पेश करने वाली
शक्ति के रूप में,
लेकिन
मेरे लिए रवीश कुमार महज़ एक
क्रांतिकारी पत्रकार नहीं
बल्कि वो शख्स हैं जिन्होंने
पिछले 4-5 सालों
में मुझे सोचने समझने,
विमर्श करने,
तर्क पेश करने
और बेमतलब के शोर में भी सच्चाई
की आवाज़ को पहचानने का सलीका
सिखाया है ।
अन्य लोगों के लिए पत्रकार
और दर्शक का रिश्ता एकतरफा
होता है पर मेरे लिए ये एक
बहुस्तरीय रिश्ता रहा है।उनके
द्वारा उठाये गए हर मुद्दे,
हर जनसमस्या
के विश्लेषण के बाद उस विषय
पर अपनी कोई भी राय बनाने के
लिए उसके बारे में और जानकारी
इकठ्ठी करना, सभी
तथ्यों की तह तक जाना और उसके
बाद ही पब्लिक स्पेस में जाकर
उसपर कुछ बोलना।
कुछ
वर्षों में उनके कई कार्यक्रम
देखने-सुनने
के बाद एक बात स्पष्ट दिखती
है जो उन्हें दूसरों से अलग
बनती है, वो
ये कि उनके व्यक्तित्व में
दोहरापन कहीं नज़र नहीं आता,
यानी जैसे वे
कैमरे के सामने होते है बिलकुल
वैसे ही वे कैमरे के पीछे भी
हैं।
कभी-कभी
अचरज होता है कि कोई व्यक्ति
कैसे इतनी स्वच्छ छवि का धारक
हो सकता है।
एक ऐसा दौर जहाँ मुख्यधारा
की हिंदी पत्रकारिता रोज़ नए
स्तर तक गिर रही है उस दौर में
भी एक पत्रकार उस सुगबुगाती
लौ की तरह नज़र आता है जो अपने
दूसरे छोर से दिए में बचे तेल
की अंतिम बूंदों को भी इस्तेमाल
करके अंधकार को मिटाना चाहता
है, जो
हर रोज़ उसी शिद्दत से अपने
पत्रकारिता धर्म को पालन करने
में विश्वास रखता है।
एक ऐसा देश जहाँ बहुत
जल्द ही किसी को भगवान या मसीहा
मान लिया जाता है वहां उन्होंने
जनमानस के हर नए मुद्दे को
उठाने की कोशिश उसी नए सिरे
से की, वो
भी बगैर मसीहा बने।
जब अन्य एंकर अपने प्राइम
टाइम पर सांप्रदायिक बातों
का शोर व दंगल करवाने और न्यूज़
रूम से ही 'ख़बर'
बनाने में
व्यस्त रहते हैं तब एक पत्रकार
बिहार, यू.पी
के गाँवों-कस्बों
में जाकर असल मुद्दों पर 25-25
मिनट की रिपोर्ट
शूट करके अपने दर्शकों के
सामने लाने का साहस करता हैं।
एक ऐसा एंकर जो किसी भी
तरह का जोख़िम उठाने को भी तैयार
रहता हैं फिर चाहे वो प्राइम
टाइम में ब्लैकआउट करना हो
या माइम कलाकारों को पैनल में
बुलाना, क्योंकि
उन्हें ये बखूबी मालूम है कि
सच सामने लाने और उसके लिए
लड़ने का काम ए.सी.
के कमरों में
बैठकर खुद की सहुलियत के हिसाब
से संपन्न नहीं हो सकता,
उसके लिए ऐसे
उन सवालों को उठाना ज़रूरी है
जो कई लोगों को असहज महसूस
करवाए।
रवीश
सर, हमारी
पीढ़ी आपके हिंदी पत्रकारिता
और सामाजिक बदलाव में दिये
गए योगदान की हमेशा आभारी
रहेगी।
हम ये जानते हैं कि हर
उपलब्धि के बाद आपसे उम्मीदें
बढ़ जाती हैं लेकिन ये गर्व के
साथ-साथ
हम सभी के लिए शर्म की बात भी
हैं क्योंकि एक ऐसे समय में
जहाँ सैकड़ों हिंदी
समाचार पत्रों और चैनलों की उपस्तिथि
हैं वहां हम एक-दो
पत्रकारों से ही खुद के लिए
खड़े होने की सारी अपेक्षाएं
कर रहे हैं।
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ReplyDeleteWith each of your new piece,our expectations of reading something more better , increases.
ReplyDeleteKeep trying👍
Thank you so much.🌸💙
DeleteBahut khub suman
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