ख़ामोशी की महफ़िल
कुछ ख़ामोशियाँ डर की है,
कुछ ख़ामोशियाँ खरीद की,
कुछ ख़ामोशियाँ बेफ़िक्री की है,
तो
कुछ हमेशा से ही ख़ामोश रहनेवालों
की |
पर
इन ख़ामोशियाँ में भी कुछ है,
जो
इस बेजान माहौल की चुप्पी को
तोड़ने में लगे हुए है |
ये
ऐसे लोग है जो खरीद और डर से
जीत पा चुके है और बोलना जारी
रखते है |
इन
बोलनेवालों से भी कुछ सीख रहे
है बोलना
पर
समस्या है कि यहाँ कुछ की
नहीं सब की ज़रूरत है |
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति 👍
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