खोखली होती सामाजिकता और शर्मसार इंसानियत
खोखली
होती सामाजिकता और शर्मसार
इंसानियत
कठुआ
और उन्नाव के कारण शुरू हुआ
मन का द्वंद्व और तूफ़ान अभी
शांत भी नहीं हुआ था कि
गुजरात
में फिर 9 साल
की मासूम से हैवानियत की हदों
को पार कर दिया गया. बार-बार
खुद के इंसान होने पर शर्म
महसूस करना एक ऐसी कुंठा को
जन्म देता है जो पूर्णतः विचलित
कर देने वाला होता है.
रोज़ाना अखबारों
के चौथे पेज पर छोटे-छोटे
कॉलमों में दर्ज होने वाले
बलात्कार के असंख्य केस भले
ही केवल एक ख़बर बनकर रह जाते
हो पर धीरे-धीरे
ये अमानवीय घटनाएं हमें खुद
से ही सवाल करने पर मजबूर कर
रही हैं कि एक मानव समाज के
रूप में हम कहाँ आ गये हैं ?
क्या हमारी
कल्पनाओं का आदर्श समाज यही
था जिसमें छोटी-छोटी
मासूम जानें इतनी अधिक दरिंदगी
का शिकार हो कि जिसके बारें
में सुनकर ही किसी की रूह काँप
जाए. आज
भारतीय समाज एक प्रकार की
शून्यता का शिकार हो चुका है.
शून्यता है
मानवीयता की, शून्यता
है संवेदनाओं की, शून्यता
है इंसान की दूसरे इंसानों
के प्रति होने वाले उस भाव की
जो उन्हें समाज के रूप में
बांधता है. विडंबना
तब और भी अधिक बढ़ जाती है जब
हम थोड़ा जागते तो है पर केवल
कुछ चुनिंदा घटनाओं पर ही और
फिर से बेहोशी और अनदेखी का
वही लबादा ओढ़ कर सो जाते है
महीनों तक.
इन
घटनाओं के ऊपर जब 'हम'
धर्म के रंग
को चढ़ा देते हैं तब संकट और भी
गहरा जाता है. आज
धर्म आस्था का नहीं बल्कि केवल
हिंसा और बहसों का ही विषय रह
गया है. ये
हमारे स्वीकारने की बात है
कि आज हमारे उपर धर्म की
आध्यात्मिकता से अधिक एक अन्य
प्रकार की खोखली धार्मिकता
हावी हो चुकी है और ये स्थिति
हमारे समाज को भीतर से बेहद
कमज़ोर करती जा रही है.
साथ ही हमने
राष्ट्रवाद के सिद्धान्तों
की भी धज्जियाँ उड़ा दी है
क्योंकि अपने हितानुसार एक
बड़ा तबका राष्ट्रीयता को स्वयं
ही परिभाषित करने में लगा हुआ
है. धर्मस्थल
में एक जघन्य अपराध का होना,
उस अपराध को
साम्प्रदायिकता का रंग देना
और फिर पीड़ित नहीं, बल्कि
अपराधियों के पक्ष में तिरंगा
यात्रा का निकलना 'हमारे'
समाज की खोखली
मानसिकता और ध्वस्त होती
सामाजिकता को दर्शाता है.
देश
के ज़िम्मेदार नागरिक बनने व
अपने सामाजिक दायित्वों को
समझने के शुरूआती अनुभवों
में ही इस प्रकार के दृश्यों
व घटनाक्रमों का सामना करने
का कभी विचार भी नही किया था.
अपने प्रतिनिधियों
व निर्णयनिर्माताओं को इस
कदर बेपरवाह देखकर गहरी निराशा
होती है और अपने ही समकक्ष
सामाजिक मानवों के इन कृत्यों
से अंतरात्मा दुखी हो उठती
है.
कुंठाओं
से अब भर जाता है मन,
ये
सोचकर कि ये कहाँ आ गये हैं
हम…..
👏👏
ReplyDeleteबहुत खूब लिखा है ।
ReplyDeleteWhen I started to read your article n went through your words-i found i couldn't put it Down n was scrolling down n down to read MORE..... emotions well expressed n thoughts beautifully written-kanak
ReplyDeleteWell expressed your thoughts...we all were wishing to make India better..but this is brutal reality of this country now these days... daughters of this country are getting gold,silver in other countries..n this is what happening to other daughters...
ReplyDelete👌👍
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