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Showing posts from April, 2018

खोखली होती सामाजिकता और शर्मसार इंसानियत

खोखली होती सामाजिकता और शर्मसार इंसानियत कठुआ और उन्नाव के कारण शुरू हुआ मन का द्वंद्व और तूफ़ान अभी शांत भी नहीं हुआ था कि  गुजरात में फिर 9 साल की मासूम से हैवानियत की हदों को पार कर दिया गया . बार - बार खुद के इंसान होने पर शर्म महसूस करना एक ऐसी कुंठा को जन्म देता है जो पूर्णतः विचलित कर देने वाला होता है . रोज़ाना अखबारों के चौथे पेज पर छोटे - छोटे कॉलमों में दर्ज होने वाले बलात्कार के असंख्य केस भले ही केवल एक ख़बर बनकर रह जाते हो पर धीरे - धीरे ये अमानवीय घटनाएं हमें खुद से ही सवाल करने पर मजबूर कर रही हैं कि एक मानव समाज के रूप में हम कहाँ आ गये हैं ? क्या हमारी कल्पनाओं का आदर्श समाज यही था जिसमें छोटी - छोटी मासूम जानें इतनी अधिक दरिंदगी का शिकार हो कि जिसके बारें में सुनकर ही किसी की रूह काँप जाए . आज भारतीय समाज एक प्रकार की शून्यता का शिकार हो चुका है . शून्यता है मानवीयता की , शून्यता है संवेदनाओं की , शून्यता है इंसान की दूसरे इंसानों के प्रति होने वाले उस भाव की जो उन्हें समाज के रूप में बांधता है . विडंबना तब और भी अधिक बढ़ जाती है जब हम थोड़ा जागते तो है पर क...

असंवेदनशीलता के चरम पर

असंवेदनशीलता के चरम पर इंसानों की बस्ती में आज इंसानियत लापता है , लाखों दिलों में आज संवेदनाएं लापता हैं , दरिंदों से भर चुका है ये दौर , मुश्किल ये है कि उनसे अधिक दरिंदें नकाबपोशों की आज सत्ता है . उसकी मासूमियत नहीं पिघला सकी उनके हैवान मन को , वो असहाय उस हैवानियत को झेलकर आखिर हार गयी उस जंग को हारकर भी फिर रोज़ हार रही है वो , अपराधियों को खुला छोड़ने के लिए नारे लग रहे है जो ये आज नहीं , ये कल नहीं ये हर दिन की सच्चाई बन चुकी है , तभी तो हर पल अब इंसानियत शर्म से झुक चुकी है मानव समाज के रूप में आज कहाँ खड़े हैं हम , क्या खुद से भी नज़रें मिलाने लायक रह गये हैं हम आदर्श लोकतंत्र की ये कैसी रीत है , कि दरिंदगी की घटनाओं पर भी धर्म की हो रही जीत है कुंठाओं से रोज़ भर जाता है अब मन , खुद से ही सवाल कर लो दोस्तों ये कहाँ आ गये हम…… ..