खोखली होती सामाजिकता और शर्मसार इंसानियत
खोखली होती सामाजिकता और शर्मसार इंसानियत कठुआ और उन्नाव के कारण शुरू हुआ मन का द्वंद्व और तूफ़ान अभी शांत भी नहीं हुआ था कि गुजरात में फिर 9 साल की मासूम से हैवानियत की हदों को पार कर दिया गया . बार - बार खुद के इंसान होने पर शर्म महसूस करना एक ऐसी कुंठा को जन्म देता है जो पूर्णतः विचलित कर देने वाला होता है . रोज़ाना अखबारों के चौथे पेज पर छोटे - छोटे कॉलमों में दर्ज होने वाले बलात्कार के असंख्य केस भले ही केवल एक ख़बर बनकर रह जाते हो पर धीरे - धीरे ये अमानवीय घटनाएं हमें खुद से ही सवाल करने पर मजबूर कर रही हैं कि एक मानव समाज के रूप में हम कहाँ आ गये हैं ? क्या हमारी कल्पनाओं का आदर्श समाज यही था जिसमें छोटी - छोटी मासूम जानें इतनी अधिक दरिंदगी का शिकार हो कि जिसके बारें में सुनकर ही किसी की रूह काँप जाए . आज भारतीय समाज एक प्रकार की शून्यता का शिकार हो चुका है . शून्यता है मानवीयता की , शून्यता है संवेदनाओं की , शून्यता है इंसान की दूसरे इंसानों के प्रति होने वाले उस भाव की जो उन्हें समाज के रूप में बांधता है . विडंबना तब और भी अधिक बढ़ जाती है जब हम थोड़ा जागते तो है पर क...