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उसने ही तो संजोया था इस शहर को

उसने ही उन धूपभरी दुपहरों में, ढलती हुई उमस की शामों में, पसीने से तर बतर होकर, संजोया था उस शहर को। उसने ही पूस की उन सर्द रातों में, कंपकपाते हुए शरीर का उन चिथड़ों में, शीतलहरों से टकराकर, संजोया था उस शहर को। आज उस शहर ने इक पल में उसे पराया कर दिया, तेरी क्या ही महत्ता है ये सवाल खड़ा कर दिया। हज़ारों मील चलने पर भी उस सड़क ने, खुद को बनाने वाले को न पहचाना। दस महीने की उस बच्ची को आज पहली बार अपने पिता के कंधे पर भी दर्द महसूस हो रहा होगा, लेकिन अभी भी मज़हब की आग को जलाए रखने वालों का दिल न पसीज़ा होगा। जो आज सड़कों पर है, सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर है, घर जाने को आतुर पर मंज़िल धूमिल है, उन्हीं लाखों ने ही तो संजोया था हमारे शहर को। 

What a heart wants

I never felt like this before... Like the waves meeting the seashore... Just want to continue with this... As all calm songs are on my lips... Sometimes there are endless talks.. And sometimes it's just silence that walks... But I love this silence too... Because it contains the essence of you.. Let's get escaped from this rush... Let's hold each other's hands and run..

शुक्रिया, रवीश सर

“ नमस्कार , मैं रवीश कुमार " अब ये महज़ चंद शब्द नहीं बल्कि गवाह है इस बात का कि जब देश का अधिकांश मीडिया सत्ता की चाटुकारिता में लिप्त था तब एक पत्रकार अपनी पूरी काबिलियत से उसी सत्ता को हर स्तर पर आईना दिखाने का कार्य कर रहा था । रवीश कुमार , एक ऐसा नाम जो किसी को जननायक की तरह लगता है तो किसी को सत्ता को हर दम चुनौती पेश करने वाली शक्ति के रूप में , लेकिन मेरे लिए रवीश कुमार महज़ एक क्रांतिकारी पत्रकार नहीं बल्कि वो शख्स हैं जिन्होंने पिछले 4-5 सालों में मुझे सोचने समझने , विमर्श करने , तर्क पेश करने और बेमतलब के शोर में भी सच्चाई की आवाज़ को पहचानने का सलीका सिखाया है । अन्य लोगों के लिए पत्रकार और दर्शक का रिश्ता एकतरफा होता है पर मेरे लिए ये एक बहुस्तरीय रिश्ता रहा है । उनके द्वारा उठाये गए हर मुद्दे , हर जनसमस्या के विश्लेषण के बाद उस विषय पर अपनी कोई भी राय बनाने के लिए उसके बारे में और जानकारी इकठ्ठी करना , सभी तथ्यों की तह तक जाना और उसके बाद ही पब्लिक स्पेस में जाकर उसपर कुछ बोलना । कुछ वर्षों में उनके कई कार्यक्रम देखने - सुनने के बाद एक बात स्पष्ट दिखती है ...

Just two of them

And at that home far far away from rush, from cemented hearts and dusted souls, it was just two of them, making their bond deeper and caring for each other. Just two of them lost in their own world of pure love, in their own home of happiness. 

'डिबेट' का महासंग्राम

" कैसे मंज़र सामने आने लगे है , गाते - गाते लोग चिल्लाने लगे है । " दुष्यंत कुमार ने ये पंक्तियाँ भले ही कई वर्षों पहले लिखी हों पर हमारे ' सो कॉल्ड ' प्रतिनिधि इसे आज साकार करने में जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं । चाहे वह राष्ट्रीय दल का प्रवक्ता हो या किसी क्षेत्रीय दल का कोई नेता , सभी ने मानो चिल्लाने और बिना तथ्यों के हल्ला करने में कोई न कोई डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स की डिग्री हासिल की हुई। शाम के 5 बजे से चैनलों पर ' डिबेट ' के नाम पर जो तमाशा शुरू होता है वो प्राइम टाइम तक आते - आते अपनी चरम सीमा पर होता है जहां कई बार बात हाथापाई और कार्यक्रम छोड़ कर जाने तक भी पहुँच जाती है। ऐसा लगता है जैसे राजनीतिक दलों ने अपने नेताओं में ' प्रवक्ता ' किसे बनाया जाए , इसे तय करने के लिए प्रैक्टिकल टेस्ट किये होंगे और ' फेक न्यूज़रूम लैब ' में जो उत्तीर्ण हुए उन्हें अलग - अलग स्तर के चैनलों के लिए चयनित किया होगा। चैनलों के ये स्तर उनके प्राइम टाइम की टीआरपी रेटिंग से तय किये जाते है। उतीर्णता के पैमाने भी सबसे ज़्यादा तेज़ और सबसे ज़्यादा समय तक चि...

सावधान! इस 'भीड़' से खतरा है

ये भीड़ अब कुछ अलग - सी है , इसकी फिज़ा अब कुछ अनजान - सी है | चेहरे तो कुछ जान पहचाने है , पर इसकी ये फितरतें कुछ खतरनाक - सी है | पहले भीड़ मिला करती थी मेलों में , किसी बड़ी सभा या बस तो कभी रेलों में | पर आज की ये भीड़ अब वो न रही , ये बन गई है सूचक हवादिस की | झूठ के फैले जाल में फंसकर , इस भीड़ ने न जाने कितनों को भयंकर मौत दी | ये भीड़तंत्र हमारे लोकतंत्र को दीमक की भांति खोखला कर रहा है , और हमारा " नेता समाज " इसके शिकार के लहू से अपनी कुर्सी चमका रहा है | ये भीड़ है तभी अपराधी होकर भी अपराधी नहीं , ये भीड़ है तभी इससे कोई बच पाता नहीं | दम निकलने तक घेरकर मारती है ये , फिर अपने ही हैवानियत के सबूत को वायरल बनाती है ये | कहाँ से बनती है ये भीड़ , ये न पूछो दोस्तों , तुम्हारे और हमारे बीच से ही ये बनती भीड़ है , तुम्हारे और हमारे बीच से ही ये बनती भीड़ है |

तू अकेला नहीं

यकीन रख , तू अकेला नहीं | इतमिनान रख , तू तन्हा नहीं | वक्त की गर्दिशें है बस ये , यूं विश्वास रख कि तू अभी हारा नहीं | तेरी सलाहियतें * अभी बहुत है , तेरी काबिलियत भी तो खूब है | संघर्षरत होकर ही यूं आज के अश्क * को अपने कल के शम - ए - मसर्रतों * में , तब्दील कर तू | 1. सलाहियतें :- सामर्थ्यता 2. अश्क :- आंसू 3. शम - ए - मसर्रत :- खुशियों का दीपक