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'डिबेट' का महासंग्राम

" कैसे मंज़र सामने आने लगे है , गाते - गाते लोग चिल्लाने लगे है । " दुष्यंत कुमार ने ये पंक्तियाँ भले ही कई वर्षों पहले लिखी हों पर हमारे ' सो कॉल्ड ' प्रतिनिधि इसे आज साकार करने में जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं । चाहे वह राष्ट्रीय दल का प्रवक्ता हो या किसी क्षेत्रीय दल का कोई नेता , सभी ने मानो चिल्लाने और बिना तथ्यों के हल्ला करने में कोई न कोई डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स की डिग्री हासिल की हुई। शाम के 5 बजे से चैनलों पर ' डिबेट ' के नाम पर जो तमाशा शुरू होता है वो प्राइम टाइम तक आते - आते अपनी चरम सीमा पर होता है जहां कई बार बात हाथापाई और कार्यक्रम छोड़ कर जाने तक भी पहुँच जाती है। ऐसा लगता है जैसे राजनीतिक दलों ने अपने नेताओं में ' प्रवक्ता ' किसे बनाया जाए , इसे तय करने के लिए प्रैक्टिकल टेस्ट किये होंगे और ' फेक न्यूज़रूम लैब ' में जो उत्तीर्ण हुए उन्हें अलग - अलग स्तर के चैनलों के लिए चयनित किया होगा। चैनलों के ये स्तर उनके प्राइम टाइम की टीआरपी रेटिंग से तय किये जाते है। उतीर्णता के पैमाने भी सबसे ज़्यादा तेज़ और सबसे ज़्यादा समय तक चि...