ख़ामोशी की महफ़िल
कुछ ख़ामोशियाँ डर की है , कुछ ख़ामोशियाँ खरीद की , कुछ ख़ामोशियाँ बेफ़िक्री की है , तो कुछ हमेशा से ही ख़ामोश रहनेवालों की | पर इन ख़ामोशियाँ में भी कुछ है , जो इस बेजान माहौल की चुप्पी को तोड़ने में लगे हुए है | ये ऐसे लोग है जो खरीद और डर से जीत पा चुके है और बोलना जारी रखते है | इन बोलनेवालों से भी कुछ सीख रहे है बोलना पर समस्या है कि यहाँ कुछ की नहीं सब की ज़रूरत है |