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आज चाह रहा है मन कि...

आज  रूह किसी याद में खोई हुई है , कहीं जाने की तमन्ना सी जगी है ,  चाह रहा है मन कि दूर चला जाये ऐसी आबोहवा से जिसमे अब रोज़ महसूस होती है घुटन। चाह रहा है मन कि दूर चला जाए इन कंक्रीट के जंगलो और सीमेंट मकानों से जो विकास  के नाम पर संवेदनहीन होते जा रहे है। बस चाह रहा है मन मेरा कि चला जाये उस जंक्शन पर जहां बड़े अक्षरों में दुर्ग स्टेशन लिखा हो , और वहीं से कुछ 70 किमी दूर आज मन है अपने गाँव जाने का , जहां आज भी पीएम 2.5 और 10 का खतरा नहीं , जहां आज भी धुल उड़ाती कच्ची सड़कें नज़र आती हैं , जहां आज भी सुबह सुबह घरों के आँगन को मिट्टी से लेपा जाता है।  बस यूँ ही मन कर जाता है कभी कभी इंडिया से दूर जाकर भारत में रहने का।   

कितने समय बाद

कितने समय बाद आज फिर उस हंसी को देखा, कितने समय बाद आज फिर चेहरे की उस चमक को देखा, देखा आज उसे जिसे रोज़ अपने साथ होने का एहसास लेती थी, सुना आज उसे जिसकी आवाज़ से ही रोज़ भावों का पता लगती थी। मेरे मज़ाकों पर उनकी ठहाकेदार हंसी का वो मज़ा, मेरी कई बेकार बातों पर उनकी नाराज़गी की सज़ा, सब मिला कितने समय बाद आज फिर, सब महसूस किया मैंने कितने समय बाद आज फिर।